क्रमाॅंक:- 167, कसडोल, जिला-बलौदा बाजार (छत्तीसगढ़) से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- रूठी प्रकृति
रूठी प्रकृति
प्रकृति कुछ रूठी-रूठी सी है,
सूर्य की निर्विघ्न तपन से।
जहाॅं कहीं भी धूप सताती,
पेड़ के नीचे झट सुस्ताते।१।
प्रकृति हमारा आर्कषण है,
युग - युग से वह सुंदर है।
जिससे होता हमारा सारा काम,
वहीं हमारा आभूषण है।२।
हवा जितनी नरम व ठंडी है,
उतनी फिजा खामोश है।
टहनियों पर पी के ओस,
हर कली बेहोस है।३।
ओस की बूॅंदें होती है दरपन के समान,
हवा की झोंका करती सबको हैरान।
बादल क्रोधित और नभ घनघोर,
बिजली चमके चारो ओर एक समान।४।
प्रकृति से नही करो खिलवाड़,
वरना झेलो प्रकृति का प्रहार।
क्यों रूठी है प्रकृति हमारी,
कहीं आ न जाए ऑंधी का कहर।५।
प्रकृति से हम बिछड़ते जा रहे जैसे,
परदेश जाकर बेटा माॅं से बिछड़ता है,
प्रकृति कुछ रूठी-रूठी सी है,
सूर्य की निर्विघ्न तपन से।६।
जंगल का विनाश करना छोड़ें,
विकास के नाम पर न पेड़-पौधे काटो।
आओ हम सब मिलकर पेड़ लगाएँ,
प्रकृति को सुंदर हरा-भरा बनाएँ।७।
परमानंद निषाद"प्रिय"
ग्राम - निठोरा,पोस्ट - थरगाॅंव,
तह.-कसडोल,जिला-बलौदा बाजार(छ.ग.)
मो.- 7974389033
8435298085
ईमेल- sachinnishad343@gmail.com
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