क्रमाॅंक:- 351, कसडोल, जिला-बलौदा बाजार (छत्तीसगढ़) से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- गृहणी बनके घर को संभालती है बहू
नित सुबह उठकर गृहणी करती सारे काम।
अपने चेहरे को वो भांप से धोती है।
परिवार के लिए ब्यंजन बनाती है।
गृहणी सुबह और शाम काम करती है।
शिक्षित होने पर भी गृहणी बनके रहती है।
सब सपनों को त्याग कर बहू बनके रहती है।
घर परिवार बच्चों के साथ सबको संभालती है।
फिर भी लोग औरत को घमंडी समझते है।
सदा रहता काम तो मोबाइल नहीं हाथ में,
उठा ना पाये फोन तो लोग घमंडी कहते हैं।
औरत के मजबूरी को औरत ही जानती है।
औरत सारे कष्टों को हँसकर सहते हैं।
औरत देवी रूप है करो नहीं उनका अपमान।
सारे संघर्षों को डटकर सामना करती है।
देकर बच्चों को संस्कार नाम कमाती है।
गृहणी बनके बहू ससुराल में रहती है।
परमानंद निषाद'प्रिय'
ग्राम - निठोरा,पोस्ट - थरगाॅंव,
तह.-कसडोल,जिला-बलौदा बाजार(छ.ग.)
मो.- 7974389033
ईमेल- sachinnishad343@gmail.com
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