क्रमाॅंक:- 657,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- आत्म-बोध और विनय
आत्म-बोध और विनय
अहंकार ही माया है, जीव फँसा इस जाल।
मिटे अहंता जब मचल, चमके आत्म-कृपाल।।
घट-घट में वह ब्रह्म है, तज तू झूठा मान।
झुककर जो पावन हुआ, पाया वही ज्ञान।।
अहंकार का तम मिटे, जले ज्ञान की जोत।
हृदय कमल तब खिल उठे, बहे प्रेम का स्रोत।।
विनय-भाव ही साधना, झुकना परम विवेक।
अहंकार को त्याग कर, देख सब में एक।।
झूठा यह संसार है, झूठा यह अभिमान।
माटी का यह गात है, तजकर गर्व पहचान।।
ममता करुणा रस बहे, निर्मल होवे चित्त।
परम तत्त्व को पा लिया, तजकर माया-वित्त।।
अहंकार की ओट में, छिपा हुआ है ईश।
पर्दा यह जो हटा दे, नवाए जग शीश।।
तरुवर झुककर फल दिए, नदिया बहे ढलान।
परमार्थ ही पंथ है, तज तू देह-गुमान।।
रावण, कंस न टिक सके, मिटा गर्व का राज।
काल चक्र सबको निगले, भज ले हरि को आज।।
अहंकार का त्याग ही, जीवन का है सार।
मुक्त जीव वह हो गया, पाकर भव से पार।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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