क्रमाॅंक:- 574, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष दोहा छंद रचना- आत्मदाता
आत्मदाता(दोहा छंद)
ज्ञान प्राण का दान दे, जीवन-दाता जान।
मन के भीतर जो बसे, सद्गुरु रूप सुजान।।1।।
कटु मीठा अनुभव भरा,नर जो सुख-दुख खाय।
तप की बूंदें आत्म की, असली मोल बताय।।2।।
इंद्रिय जीते ठाठ से, मनमुख हो खुशहाल।
सबका जो चेतन बना, विरह दीन बेहाल।।3।।
जप तप दूजा जन करे,फल दूजा ले जाय।
लिखा कहाँ अध्यात्म में, यह कैसा अन्याय?।।4।।
निष्ठा मेरी जाँचते, माया डूबे लोग।
प्रेम मापते तर्क से, पापी पाले रोग।।5।।
विषयों का चस्का लगा, बने जगत के मीत।
मोह फँसे जब जीव तब, गाए उल्टी रीत।।6।।
शून्य बीच जीवन कटे, मन फिर भी है चंग।
सत्य नाम सेवा करे, चढ़ा भक्ति का रंग।।7।।
अलख पुरुष से नेह है, चेतन तात स्वरूप।
आत्म-बोध ही यज्ञ है, यही आदि-प्रखरूप।।8।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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