क्रमाॅंक:- 576, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष दोहा छंद रचना- आत्म-बोध और धर्म-पथ
आत्म-बोध और धर्म-पथ(दोहा छंद)
देह मनस आत्मा सकल, मृदु निर्मल आकाश।
शाँति शरण अरु वास है, चेतन परम प्रकाश।।1।।
मुक्त रहे संवाद पथ, शुभ विवेक यह मूल।
बोध भरा संज्ञान ही, तजे जगत की धूल।।2।।
इच्छा व्याधि अनन्त है, द्वंद्व और पाखंड।
गूँज रहाँ अहंकार है, माया रूप प्रचंड।।3।।
साधत बाधा आ मिली, सोया मन अज्ञान।
चोट सहे जग में सभी, तज निज हित का ध्यान।।4।।
अर्पण मौलिक सहज हो,सधे अल्प ही यत्न।
भक्ति-पात्र जब भर गया,प्रकट आत्म शुभ रत्न।।5।।
लक्ष्य सदा ही योग हो, कर्म तपस्या जान।
ज्ञान मार्ग पर बढ़ चलें, तजकर सब अभिमान।।6।।
थाती जो संस्कार की, आचरणों का बोध।
शिष्य ज्योति जगमग करे, तजकर सारा क्रोध।।7।।
धर्म राह से ही मिले, ईश कृपा सुख-धाम।
ऋषि-ऋण अब हम सब भरें, कर कुछ उत्तम काम।।8।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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