क्रमाॅंक:- 586, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष छंदमुक्त रचना- कौंदकेरा: एक आदर्श ग्राम
कौंदकेरा: एक आदर्श ग्राम
प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक परिवेश
कानन-सरिता-तट बसा, कौंदकेरा अभिराम।
प्रकृति-नटी की गोद में, शोभित अनुपम धाम।।
सामाजिक सद्भाव (आध्यात्मिक दृष्टि)
विविध पंथ संगम यहाँ, राम-रहीम एक भाव।
घट-घट वासी एक है, मिटा भेद-दुर्भाव।।
कुर्मी, गोंड, निषाद सँग, तेली जाति प्रधान।
सह-अस्तित्व की साधना, जग में बने मिसाल।।
विद्या एवं साक्षरता
ज्ञान दीप जलता यहाँ, विद्या सदन अनूप।
अक्षर-अक्षर ब्रह्म है, सरस्वती का रूप।।
नर सत्तर, नारी सुघर, शिक्षा पथ गतिमान।
किन्तु अल्प-वय ब्याह दे, बाधक बने विधान।।
प्रशासनिक एवं बाल विकास
पंचायत की सभा में, गूँजे लोक-आवाज।
आँगनबाड़ी केंद्र से, सँवरे बाल-समाज।।
आर्थिक स्थिति
धान्य पूर्ण यह धरा है, कष्ट न भूख सताय।
कृषि-गऊ सेवा मगन, जन-मन सुख बरसाय।।
वाणिज्यिक अरु चाकरी, उदर-पूर्ति के काज।
परमेश्वर की कृपा से, सोहे सकल समाज।।
जल संसाधन (स्वार्थ त्याग और सेवा)
त्रय सरोवर शुचि सलिल, जैसे तीरथ धाम।
मुरूम दान हित दे दिया, तजकर लोभ-लगाम।।
पूर्वज-निर्मित बाँध यह, संचय का वरदान।
खेत सींचती अमृत बन, वर्षा की मुस्कान।।
पशुपालन (गौ सेवा)
सुरभि-शरण गोठान है, चारे का परबंध।
सेवा में ही पा रहे, जन-जन आत्मानंद।।
बकरी-धेनु पालते, श्रद्धा-भाव अपार।
गऊ कृपा से फल रहा, घर-आँगन परिवार।।
आस्था
पीपल पावन मध्य में, हनुमत का दरबार।
मानस भवन गुंजायमान, राम-कथा रसधार।।
दीपावली गौरा-भजन, एकता का आधार।
सोनई-रुपई माँ खड़ीं, करतीं बेड़ा पार।।
प्राकृतिक संपदा
हरड़, बहेड़ा, नीम तरु, पीपल देव-स्वरूप।
अमृत फल पावन यहाँ, प्रकृति दिव्य अनूप।।
मृग नयनी अब खो गए, सिमट रहा वन-धाम।
वन्य जीव संकट में हैं, सुमिरे अंतर्याम।।
संचार एवं आधुनिकता
पथ सुगम है नगर का, सुलभ ज्ञान की डोर।
अंतर्जाल की रश्मियाँ, फैलीं चारों ओर।।
सुविधा की अनुकम्पा है, कौंदकेरा के द्वार।
पर भौतिकता ओढ़ती, माया का विस्तार।।
चुनौतियां एवं आध्यात्मिक बोध
व्यसन-अग्नि में जल रहे, क्या बूढ़े क्या बाल।
कुसंगत और प्रमाद ने, बुना मोह का जाल।।
संवादों की शून्यता, अंतर्मन का क्लेश।
चेतो! समय रहते तजो, ये तामसी परिवेश।।
प्रकृति - प्रभु की विभूति
हरितकी, पीपल, निम तरु, ईश रूप साक्षात।
अमृत रस बरसे यहाँ, प्रभु की दिव्य सौगात।।
मृग-छौने विलुप्त हुए, स्वार्थ बढ़ा चहुँ ओर।
प्रकृति माँ को पूजिए, तज कर तृष्णा-शोर।।
माया का जाल (व्यसन एवं चुनौती)
मदिरा और कुसंग ने, छीना आत्मिक ज्ञान।
भटके युवा प्रमाद में, भूल रहे भगवान।।
यंत्र-जाल में खो गया, पावन कुल-संवाद।
भीतर बढ़ती रिक्तता, बाहर है अवसाद।।
आध्यात्मिक समाधान
कौंदकेरा की चेतना, जागो तज कर मोह।
राम-नाम हृदय धरो, मिटे द्वन्द्व-विद्रोह।।
स्वच्छ करो निज देह-मन, दिव्य भाव विस्तार।
सच्चा सुख तब पाइए, तज तामस विकार।।
निष्कर्ष
प्राकृतिक निधि ईश की, मर्यादा अनमोल।
स्वच्छ करो निज चेतना, सत्य हृदय में तोल।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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