क्रमाॅंक:- 587, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष आलेख- प्रदूषण का अभिशाप: अस्तित्व पर गहराते संकट

क्रमाॅंक:- 587, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष आलेख- प्रदूषण का अभिशाप: अस्तित्व पर गहराते संकट

प्रदूषण का अभिशाप: अस्तित्व पर गहराते संकट

"आज धरती का तापमान बढ़ रहा है, ग्लेशियर पिघल रहे हैं और ओजोन परत पतली हो रही है। दिल्ली जैसी महानगरों का 'गैस चैंबर' बनना और यमुना का जहरीला होना अब कोई चौंकाने वाली खबर नहीं, बल्कि हमारी नियति बनती जा रही है।
उन्नीसवीं सदी की औद्योगिक क्रांति ने जिस विकास का सपना दिखाया था, उसने शनै-शनै पर्यावरण का दम घोंटना शुरू कर दिया। धुंआ उगलती चिमनियों और अंधाधुंध शहरीकरण ने प्रकृति का जो दोहन शुरू किया, उसे पूंजीवाद ने 'उपभोक्तावाद' की आग में झोंक दिया। आज विश्व एक बाजार बन चुका है, जहाँ 'माल बेचो और मुनाफा कमाओ' ही एकमात्र मंत्र है।
विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय देशों ने विकसित होने की इस दौड़ में पर्यावरण संतुलन को ताक पर रख दिया। विडंबना देखिए कि विश्व की मात्र कुछ प्रतिशत जनसंख्या वाले ये समृद्ध देश वैश्विक संसाधनों के विशाल हिस्से का उपभोग कर रहे हैं। जहाँ एक तरफ वैश्विक मंचों पर 'क्लीन एनर्जी' की कसमें खाई जाती हैं, वहीं दूसरी ओर आर्थिक हितों के टकराव और परमाणु परीक्षणों की होड़ ने वातावरण को और दूषित किया है।
विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद, ठोस प्रयासों की कमी खली है। यदि अब भी हमने प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व का मार्ग नहीं चुना, तो आने वाली पीढ़ियों के पास 'विकास' तो होगा, लेकिन सांस लेने के लिए 'हवा' और प्यास बुझाने के लिए 'शुद्ध जल' नहीं बचेगा।"

                   "अब यदि हम भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह हकीकत है कि आर्थिक रूप से सबल बनने हेतु हमें बड़े उद्योगों और कल-कारखानों की आवश्यकता है, ताकि हमारे युवाओं को रोजगार मिल सके, सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की दर बेहतर बनी रहे और हम विकसित देशों का मुकाबला कर सकें।

                  इस परिप्रेक्ष्य में, प्रदूषण फैलाने वाली पुरानी औद्योगिक इकाइयों को बंद कर उनके स्थान पर 'इको-फ्रेंडली' और आधुनिक तकनीक से युक्त इकाइयों की स्थापना करना समय की मांग है। साथ ही, प्रदूषित क्षेत्रों की पहचान करना, दूषित जल का उपचार (Treatment) करना और वर्षा जल का संरक्षण एवं संवर्धन करना आज की महती आवश्यकता है। यह सुखद है कि सरकार द्वारा इस दिशा में कुछ सार्थक पहल की जा रही हैं।"

                 "पर्यावरण सुधार के मार्ग में सबसे बड़ी चुनौती संबंधित कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन है। तमाम प्रयासों के बावजूद इन्हें सख्ती से लागू नहीं किया जा पा रहा है। अक्सर राजनीतिक लाभ और औद्योगिक घरानों से मिलने वाले चंदे के कारण सरकारें कड़े कदम उठाने से हिचकती हैं। साथ ही, जनसाधारण में जागरूकता का अभाव भी एक बड़ी बाधा है; उदाहरण के लिए, मिट्टी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक 'सिंगल यूज प्लास्टिक' पर अब तक पूर्णतः रोक नहीं लग पाई है।

                सरकारों और जनता के बीच स्वयंसेवी संस्थाएं (NGOs) एक महत्वपूर्ण कड़ी का कार्य करती हैं। ये संस्थाएं संदेशों, नुक्कड़ नाटकों, कविताओं और अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से जनजागरूकता फैला रही हैं। आज हमारे बीच ऐसे कई व्यक्तित्व और संगठन हैं, जो जल एवं वायु संरक्षण, वृक्षारोपण और प्लास्टिक मुक्त समाज के लिए निरंतर अभियान चला रहे हैं।"

                  "इनमें कुछ ऐसे प्रतिष्ठित नाम हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित हैं, तो कुछ ऐसे उभरते नाम भी हैं जो अपना कार्य बखूबी अंजाम दे रहे हैं। वर्तमान समय में पृथ्वी, प्रकृति एवं पर्यावरण का संरक्षण सबसे महत्वपूर्ण है; यह आज के युग की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गई है। इनके संरक्षण में हम व्यक्तिगत, सामाजिक और सामूहिक स्तर पर अपना योगदान दे सकते हैं। 'जल है तो कल है' और 'शुद्ध हवा, प्राकृतिक हवा' जैसे नारे केवल गूंजने ही नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें आत्मसात भी किया जाना चाहिए।

                  विशेषज्ञ लगातार इस विषय पर चिंता व्यक्त कर रहे हैं और संस्थाएं आए दिन नए शोध प्रकाशित कर रही हैं। 'अभी नहीं तो कभी नहीं'—यह विचार हमारे केंद्र में होना चाहिए। बढ़ते बाजारवाद के कारण प्रकृति से हमारे संबंध डगमगा गए हैं। प्रकृति, जो कभी हमारे लिए आदर, प्रेम और रक्षा की प्रतीक थी, आज अत्यंत प्रदूषित हो चुकी है। उपजाऊ खेतों और घने जंगलों को काटकर वहां मॉल, बहुमंजिला इमारतें और फैक्ट्रियां खड़ी की जा रही हैं। इन कारखानों से निकलने वाला विषाक्त कचरा हमारी नदियों को दूषित कर रहा है और विभिन्न प्रकार की गैसों से वायुमंडल जहरीला हो चुका है।

                   भारत की 'भोपाल गैस त्रासदी' और रूस की 'चेरनोबिल' परमाणु दुर्घटना की भयावहता को लोग आज भी भूले नहीं हैं। दूषित जल और वायु के कारण नित नए रोग जन्म ले रहे हैं, जिससे मनुष्य की औसत आयु दिन-प्रतिदिन घटती जा रही है। ऋतुओं का चक्र भी असंतुलित हो गया है—समय पर वर्षा न होना, बेमौसम अतिवृष्टि, ओलावृष्टि और अनियंत्रित हिमपात पर्यावरण के लिए अत्यंत घातक सिद्ध हो रहे हैं। भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो पर्यावरण 'पंचतत्वों' का पावन योग है, जिसकी रक्षा करना हमारा परम कर्तव्य है।"

                "क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा।" पाश्चात्य दृष्टि वस्तुतः विश्व को टुकड़ों-टुकड़ों में देखती है, किंतु भारतीय दर्शन प्रत्येक बिंदु को समग्रता एवं पूर्णता में देखता है। "वसुधैव कुटुंबकम्", "सर्वे भवन्तु सुखिनः" और "ॐ द्यौ: शान्तिः, अन्तरिक्षं शान्तिः, पृथिवी शान्तिः, आपः शान्तिः..."—यही हमारा मूल दर्शन है।

                    यहाँ पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, वृक्ष, वायु, जल, अग्नि और आकाश मात्र जड़ नहीं, बल्कि सचेतन और पूजनीय हैं। इनका स्वतंत्र अस्तित्व और गहरा प्रभाव है; ये समस्त जीव-जगत के साथ एकात्म हैं। मनुष्य और प्रकृति के बीच यहाँ परस्पर सह-अस्तित्व का भाव है। ज्ञान के अक्षय भंडार 'वेद' ऋषियों द्वारा वनों में तपस्या करते हुए लिखे गए। उन्होंने प्रकृति के प्रत्येक तत्व पर गहन मीमांसा व शोध किया और इन्हें जीवन का 'प्राणतत्व' माना।

                  आज प्रकृति के इन प्राणतत्वों का प्रदूषित होना न केवल मानव जाति, बल्कि समस्त जीवमात्र के लिए संकट है। प्राकृतिक तत्वों के पूजन की भारतीय परंपरा कोई रूढ़िवादिता या दकियानूसी सोच नहीं, बल्कि पूर्णतः वैज्ञानिक आधार पर टिकी है। वर्तमान के वैश्विक संकटों और पर्यावरण प्रदूषण का वास्तविक समाधान हमारे भारतीय दर्शन में ही निहित है।
       
                  अतः, हम नदियों, पर्वतों, वायु, जल, पृथ्वी, आकाश और ग्रह-नक्षत्रों को पुनः आदरणीय मानकर इस बिगड़ते पर्यावरण के विरुद्ध एकजुट हों। हमें आडंबर एवं भोग-विलास की जीवनशैली का त्याग कर सादगी और प्राकृतिकता की ओर लौटना होगा। आइए, पर्यावरण को उसके परम मूल स्वरूप में पुनः स्थापित करने का संकल्प लें।

                      परमानंद निषाद 'प्रिय'

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