क्रमाॅंक:- 590, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- आत्म-विजय और पुरुषार्थ
आत्म-विजय और पुरुषार्थ
तज निद्रा चैतन्य हो, तज अज्ञान-अँधेर।
रग में जो पौरुष नहीं, वह पानी का ढेर।।
भाग्य-लेख को काट दे, कर ऐसा पुरुषार्थ।
सफल वही जो पा गया, निज जीवन का अर्थ।।
मन चंचल की धार तज, बन जा तू अविराम।
श्रम की समिधा में जले, आलस-मोह-तमाम।।
व्यर्थ श्रृंगार न कर अरे, आत्म-ग्लानि को त्याग।
सत्य-पंथ पर चल अभी, अंतर-ज्योति जगाग।।
धैर्य धार बढ़ता चलूँ, सम्मुख लक्ष्य अनूप।
मरुथल में भी खिल उठे, सृजन-स्वर्ण का रूप।।
इम्तिहान की घड़ी है, रख मन में विश्वास।
आज अकेला पथिक है, कल दुनिया तेरे पास।।
मन की जो न मान कर, जीता है जग-माह।
उसी महा-निर्वाण की, मिल जाती है राह।।
अविरल बहती सरित-सी, गति में जीवन जान।
बाधाएँ झुक जाएँगी, सुन तेरा जयगान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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