क्रमाॅंक:- 594, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-पितृ-छाया और परिवार
पितृ-छाया और परिवार
पिता खड़े आधार बन, घर की गौरव शान।
पुत्र-पुत्री साथ हैं, बढ़ा रहे सम्मान।।1।।
श्वेत वस्त्र धारण किए, सौम्य रूप सुखधाम।
मस्तक पर तिलक सोहे, जपते प्रभु का नाम।।2।।
संस्कारों की धरोहर, पिता हृदय का प्यार।
जिनकी शीतल छाँव में, महकता यह परिवार।।3।।
रुद्राक्षों की माल है, भक्ति भरा है मन।
पिता चरणों में यहाँ, स्वर्ग जैसा पावन।।4।।
एक पुत्र जैकेट लिए, मुख पर है मुस्कान।
आधुनिकता के साथ भी, है कुल का अभिमान।।5।।
दूजा पुत्र विनीत है, केसरिया है संग।
युवा शक्ति में दिख रहा, देशभक्ति का रंग।।6।।
सादे भूरे वेश में, पुत्री मन की प्रीत।
धैर्य, शील और लाज की, गाती पावन गीत।।7 ।।
पृष्ठभूमि का दृश्य भी, बढ़ा रहा है मान।
नदी, पहाड़ और धूप से, प्रकृति है बलवान।।8।।।
आसन पर अंकित यहाँ, 'ॐ' शब्द सुखकारी।
गूँज रही है गूँज जो, लगती बड़ी प्यारी।।9।।
पिता खड़ा वटवृक्ष सा, देता सुख की छाँव।
मजबूत उन्हीं के हाथ से, घर की सुंदर नाव।।10।।
हाथ जोड़ आशीष दें, सुखी रहे संतान।
पिता ही हैं इस जगत में, ईश्वर के समान।।11।।
अनुशासन और प्रेम का, सुंदर है मेल।
इन्हीं से सजता सदा, जीवन का यह खेल।।12।।
नंगे पाँव धरा छुए, मिट्टी का सम्मान।
यही सिखाती हमें सदा, अपनी ही पहचान।।13।।
मस्तक ऊँचा है खड़ा, पिता का यह गौरव।
संस्कारों से फैल रहा, खुशियों का सौरभ।।14।।
चारों चेहरे खिल रहे, मन में है उल्लास।
एक दूसरे पर यहाँ, गहरा है विश्वास।।15।।
त्याग, तपस्या और श्रम, पिता का है गहना।
संकट में भी सिखाते, धीरज से ही रहना।।16।।
एक सूत्र में बंध गया, छोटा सा परिवार।
पिता प्रेम की मिल रही, पावन अविरल धार।।17।।
श्वेत वस्त्र की शुभ्रता, मन की निर्मल धार।
पिता ही तो होते हैं, खुशियों का आधार।।18।।
चित्र अनूठा यह कहे, प्रेम रहे हर द्वार।
पिता, धर्म और सत्य ही, जीवन का आधार।।19।।
माँ की कमी न खले अब, ऐसी पिता की प्रीत।
संस्कारों से जीत लें, दुनिया की हर रीत।।20।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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