क्रमाॅंक:- 615, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- दाम्पत्य प्रेम और उत्सव
दाम्पत्य प्रेम और उत्सव
नेह-नीर से सींचकर, महकाया संसार।
वर्षगाँठ यह ला रही, खुशियों की बौछार।।
माथे तिलक सोहे पिया, गोरी माँग सिंदूर।
सजी आरती प्रेम की, मिटे क्लेश सब दूर।।
गले हार कंचन चमक, मुख पर मंद मयंक।
हाथ पिया का कंधे पर, मिटे सकल आतंक।।
श्वेत दुपट्टा बापु का, सादगी का है रूप।
नीली साड़ी में सजी, गृहलक्ष्मी अनूप।।
सुख-दुख के हर मोड़ पर, बढ़ता जाए प्यार।
एक-दूजे के संग से, महके यह संसार।।
विश्वासों की डोर से, बंधा हुआ यह नेह।
एक प्राण बनकर जिएँ, भले भिन्न हों देह।।
सदा सलामत यह रहे, हँसती-गाती जोड़ी।
समय कभी भी ला न पाए, इनमें किंचित दूरी।।
सात जनम का साथ हो, शिव-पार्वती सा रूप।
जीवन-पथ पर छाँव दे, चाहे तीखी धूप।।
आँखों में आदर बसा, मन में गहरा प्रीत।
युग-युग तक गाते रहें, मधुर मिलन का गीत।।
मंगलमय बेला सजी, गूँजे सुमधुर गान।
वर्षगाँठ पर मिल रहा, जोड़ी को सम्मान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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