क्रमाॅंक:- 627,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- कृष्ण-संदेश और कर्म
कृष्ण-संदेश और कर्म
श्रीकृष्ण कहते सदा, तज माया का छद्म।
साधन-पथ पर तुम चलो, पा जाओगे पद्म।।
काल-चक्र जब घूमता, सुध-बुध खोए इंसान।
नृपति तुरंत ही रंक बन, मिटे सभी अभिमान।।
कपट न मन में राखिए, तजिए सब छल-रीत।
निश्छल मन जो रखत है, तासों हरि की प्रीत।।
दुखी न कीजे आत्मा, प्राणी की तुम आज।
घट-घट में माधव बसें, बिगड़ेगा सब काज।।
जैसा बोओगे यहाँ, वैसा ही फल पाय।
विधि के संचित लेख से, कोई बच न पाय।।
मुकुट धारी माधव कहें, सुनो पार्थ तुम बात।
छल करता जो जीव है, खुद को देता मात।।
रसना से हरि-नाम कह, हृदय रखो तुम साफ।
किल्विष मन में यदि रहा, प्रभु न करते माफ।।
बाहर शुचि केवल बनो, भीतर पातक ताप।
भव-बंधन जब कसता है, रोए अपने आप।।
पर-पीड़ा को जानकर, तजो मोह-अज्ञान।
माधव की इस सीख को, मानो चतुर सुजान।।
असत्य-खेती जो करे, काटे दुःख की फसल।
ईश-न्याय सबसे बड़ा, कृष्ण कहें यह असल।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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