क्रमाॅंक:- 634,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- रिकॉर्ड की अंधी दौड़
रिकॉर्ड की अंधी दौड़
कागज के टुकड़े मिले, बढ़ा रात-दिन मान।
भीतर से खाली हुआ, आज का ये इंसान।।
दौड़ रहे सब अंधी धुन, पाने को सम्मान।
सच्चा ज्ञान बिसार कर, ढूँढ़ रहे पहचान।।
रिकॉर्डों के नाम पर, छिड़ा हुआ है जंग।
दिखावे की धूप में, उड़ा करम का रंग।।
सच्ची सेवा खो गई, बढ़ा पत्र का चाव।
भीतर का खालीपन छिपा, झूठा है ये भाव।।
मेडल चमके कण्ठ में, मन में भरा अँधेर।
सस्ते नाम के वास्ते, लगा रहे सब ढेर।।
गिनती में नंबर बढ़े, घटी हृदय की प्रीत।
नाम कमाने के लिए, भूले जग की रीत।।
ज्ञानी बैठे मौन हैं, मूर्ख कर रहे शोर।
कागज के सम्मान की, खड़ी दिखी हर छोर।।
कर्म अधूरा ही रहा, पूरा हुआ रिकॉर्ड।
भीतर खोई सादगी, बाहर केवल ठाठ।।
प्रमाण पत्र की चाह में, तजा स्वयं का मूल।
दिखावे की चाहत बनी, जीवन की बड़ी भूल।।
सच्चा आदर वह मिले, जो मन में हो जाय।
कागज का सम्मान तो, धूलि में मिल जाय।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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