क्रमाॅंक:- 653,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- नकटी गाँव का दर्द
नकटी गाँव का दर्द
घर टूटा उम्मीद का, बिखरा सब सामान।
सत्ता के इस खेल में, रोता है इंसान।।
रो-रो आँखें सूज गईं, सुनता नहीं पुकार।
गरीबों के आशियाने पर, चला यहाँ बुलडोज़र यार।।
मलबा बिखरा राह में, टूटे दिल के ख़्वाब।
इस बर्बादी का भला, कौन देगा अब जवाब।।
सत्ता की इस भूख ने, छीना सबका चैन।
मजबूरी को देखकर, रोते दिन और रैन।।
वृद्ध आँखें ढूँढतीं, अपनी वही ढह चुकी दीवार।
कहाँ छुपाएँ सिर अब हम, उजड़ गया परिवार।।
बच्चे बैठे राह पर, भूल गए सब खेल।
भूख और बेघर होने का, झेल रहे वे झेल।।
जमीन खाली कर ली है, नाम विकास का देकर।
गरीब बेचारा क्या करे, अपनी किस्मत को रोकर।।
माताओं के आँसू बहते, बिलख रहे हैं बाल।
क्रूर व्यवस्था ने किया, ऐसा इनका हाल।।
तन पर कपड़े फट गए, सर पर बची न छाँव।
दर्द से तड़प रहा है आज, यह पूरा का पूरा गाँव।।
न्याय की चौखट दूर है, सुनता नहीं कोई रोना।
गरीबों के नसीब में लिखा, केवल आँसू धोना।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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