क्रमाॅंक:- 660,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-प्रेम का शाश्वत स्वरूप
नं
प्रेम का शाश्वत स्वरूप
स्वार्थ-मृत्तिका में कभी, जमे न प्रेम-सनेह।
यह आकाश-कल्पतरु, निर्मल भाव-अनेह।।1।।
छल-कपट-अहंकार की, मिटे यहाँ पर छाँह।
त्यों रवि सम्मुख तम छुपे, प्रेम-शरन जो आंह।।2।।
सरिता सम सागर मिले, प्रेम न होवे अंत।
बादल, धरती, पात जो, बरसे सदा बसंत।।3।।
सींचन की चाहत नहीं, अश्रु-याद अमृत रूप।
सूखे नहिं चेतना-स्वभाव, ऋतुएँ यहाँ अनूप।।4।।
दूरी तोड़े साथ जो, बदले रूप हुलास।
घटे-बढ़े नहिं प्रेम यह, ध्रुवतारा प्रकाश।।5।।
तन की दूरी से कभी, मिटे न प्रेम-अनुभूत।
धड़कन में यादें जियें, वर्तमान अवधूत।।6।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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