क्रमाॅंक:- 672,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- बचपन की यादें
बचपन की यादें
साइकिल की वह सैर याद, सावन की वह छाँव।
पिता कँधैया जब बने, स्वर्ग हुआ था गाँव॥
रोटी आधी खा मिले, मीठी मन की चाट।
पिता हाथ का कौर वह, जैसे जग का ठाट॥
उँगली पकड़े घूमना, मेलों की वह धूम।
काँधे चढ़कर देखना, नभ को लेना चूम॥
गिरते जब हम राह में, दौड़ उठाते आप।
धूल झाड़कर चूमते, मिट जाता सब ताप॥
माँग खिलौने की कभी, रूठ बैठते गेह।
जेब खाली थी मगर, जीत गया वह नेह॥
कागज़ की वह नाव औ', बरखा का वह शोर।
थामे रखते थे पिता, जीवन की हर डोर॥
कहानियाँ परियों की औ', चंदा मामा दूर।
लोरी गाते थे पिता, सुख मिलता भरपूर॥
गलती पर वह डाँटना, फिर गोदी में ले लें।
बिस्कुट, टॉफ़ी हाथ में, हँसकर हमको दे दें॥
गर्मी की वह रात थी, छत पर बिछी चटाई।
हाथ हिलाकर पंखा झलें, याद पिता की आई॥
बचपन बीता पंख ले, छूने को आकाश।
यादें फिर भी जीवित हैं, पिता-प्रेम का प्रकाश॥
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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