क्रमाॅंक:- 673,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- आँगन की कली
आँगन की कली
छवि अनुपम अति लाड़ली, बैठी चटाई मान।
मन हरती हर मोड़ पर, भोली सी मुस्कान।।
गुलाबी पोशाक में, लगती परी समान।
माथे बिंदिया सोहती, हरती सबका ध्यान।।
सिर पर सुंदर फूल है, बाँधे सुंदर केश।
रूप अनूठा बाल का, मन भावन यह भेष।।
प्यारी चंचल आँखियाँ, चितवन अति सुकुमार।
देख-देख रीझे जिया, उमड़े अनुपम प्यार।।
हाथों में चूड़ी सजे, पैरों में पैंजनी खास।
आँगन में बिखरा हुआ, जैसे सुख का रास।।
नटखट भोली चेष्टा, सुंदर रूप अनूप।
घर आँगन पावन करे, बेटी ईश्वर रूप।।
गोद उठावन को मचल, करता सबका मन।
तुलसी सी पावन लगे, महकाए यह तन।।
सज-धज बैठी लाडली, जैसे कोई फूल।
इसकी इक मुस्कान से, मिटते सारे शूल।।
बचपन की सुंदर छटा, न्यारा इसका ढंग।
जीवन में भरती सदा, खुशियों के सौ रंग।।
बेटी आँगन की कली, घर का है सम्मान।
इसकी प्यारी रूप में, बसती सबकी जान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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