क्रमाॅंक:- 674,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- लाडली का रूप निराला
लाडली का रूप निराला
गुड़िया जैसी दिख रही, गोरी प्यारी बाल।
मुख पर उंगली रख रही, सुंदर रूप रसाल।।
गुलाबी पोशाक में, लगती बड़ी अनूप।
बैठी है सुंदर सजी, पावन चंचल रूप।।
दो चोटी सिर पर सजी, फूलों जैसे लाल।
काजल की बिंदी सजे, चमके गोरे गाल।।
पैरों में पायल बंधी, बाजे रुनझुन आज।
नन्ही सी मूरत सजी, मन को भाए साज।।
फूलों जैसी जूतियाँ, पहने सुंदर बाल।
पलकें झुकतीं प्यार से, रूप हुआ बेमिसाल।।
हाथों में कंगन सजे, काले गोरे रंग।
मासूमियत से भरी, चंचलता के संग।।
पलने जैसी सेज पर, बैठी राजकुमारी।
नजर न लागे लाडली, जग से लगती प्यारी।।
भरी भरी सी बाँहें हैं, कोमल पावन अंग।
छवि निराली देख कर, मन में उठे उमंग।।
घर की लक्ष्मी रूप यह, आँगन की मुस्कान।
भोली भाली दृष्टि से, लेती सबके प्रान।।
ईश्वर का वरदान है, नन्ही सी यह जान।
देख इसे ही मिल रहा, मन को सच्चा गान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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