क्रमाॅंक:- 675,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- वात्सल्य की छाँव
। वात्सल्य की छाँव
गोदी में बेटी हँसे, पाकर पिता का प्यार।
जैसे आँगन में खिला, सुंदर फूल बहार।।
कंधों पर बैठी सदा, देखे नई उड़ान।
पिता रूप में मिल गया, बेटी को आसमान।।
लाडो की हर एक ख़ुशी, पिता का है संसार।
छोटा सा यह रूप ही, जीवन का आधार।।
उँगली पकड़े बाप की, सीखे चलना राह।
बेटी की हर जीत की, मन में रहती चाह।।
घर की रौनक बिटिया, खुशियों का पैगाम।
थके पिता को मिल रहा, देख इसे आराम।।
माथे पर बिंदिया सजे, पैरों में पायल बाज।
बेटी के इस रूप पर, पिता करे है नाज।।
काँटों से महफूज़ रखे, जैसे सुंदर फूल।
पिता छुपाकर रखता है, हर विपदा की धूल।।
इक दूजे की ढाल हैं, इनका अनुपम नेह।
जैसे हो सावन घटा, बरस रहा हो मेह।।
हँसी लाडली की बने, सुख का अनुपम स्रोत।
जैसे मंदिर में जले, श्रद्धा की पावन जोत।।
दुनिया की हर मुश्किलों, से लड़ जाता बाप।
बेटी की मुस्कान से, मिटता सारा ताप।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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