क्रमाॅंक:- 678,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- प्रज्ञा और प्रकृति
प्रज्ञा और प्रकृति
हाथ लिए पुस्तक खड़ी, सुंदर सहज स्वरूप।ममतामयी इस मूरत का, दिखे ढंग अनूप।।
ऋचा नाम की पुस्तक यह, दे पावन संदेश।
ज्ञान दीप जग में जले, मिटे सकल कलेश।।
हरे रंग की साड़ी में, लगतीं अति अभिराम।
मुख पर अनुपम सौम्यता, मन को मिले विश्राम।।
पीछे बहता नीर है, पावन शांत तलाव।
छवि देख मन में जगे, निर्मल सुंदर भाव।।
माथे पर सिंदूर है, सुहाग की है शान।
संस्कृति की मर्यादा का, करा रही भान।।
नयनों पर चश्मा सजे, प्रज्ञा का आधार।
सरल हृदय की स्वामिनी, ज्ञान का है विस्तार।।
ऋचा ग्रंथ को हाथ में, लिए खड़ी सहर्ष।
साहित्य के आँगन में, उपजा है उत्कर्ष।।
हरी चुनरिया ओढ़कर, प्रकृति रूप सुकुमार।
जैसे इस वसुधा को मिल गया, सुंदर एक सिंगार।।
मंद-मंद मुस्कान है, अधरों पर सुखरास।
मन के सारे द्वंद्व को, करे पल में नास।।
ज्ञान, शील और सादगी, अद्भुत सुंदर मेल।
इस पावन तस्वीर में, दिखे विधाता का खेल।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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