क्रमाॅंक:- 680,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- देशभक्ति और कर्तव्य
देशभक्ति और कर्तव्य
मातृभूमि की धूलि तो, चंदन जैसा गेह।
देशभक्ति ही दे रही, जीवन को नव नेह।।
जननी जनममही, स्वर्ग से हैं श्रेष्ठ।
इनकी रक्षा ही कहे, संस्कृति धर्म सुजेष्ठ।।
वीर, सुभट और सूरमा, अर्पण करके प्राण।
तब जाकर हमको मिला, यह पावन निर्वाण।।
अमर शहीदों के लहू, सींचा देश स्वतंत्र।
तभी तिरंगा गा रहा, आजादी का मंत्र।।
वस्त्र-खंड यह है नहीं, यह बलिदान प्रतीक।
रहन-सहन इसका रहे, मर्यादा के ठीक।।
जो सुराज हमको मिला, उसका करें सुमान।
रक्षा और विकास ही, अपना परम विधान।।
त्याग वीर बलिदान से, मिली हमें आजाद।
गीता के निष्काम बन, कर्म हुए आबाद।।
रण में अर्जुन से सजे, वीर पूज्य दिन-रैन।
मातृभूमि से जोड़ कर, कृष्ण-पार्थ के नैन।।
महान वे ही जग बने, स्वार्थ बिना जो वीर।
कर्म-रेख से खींचते, गौरव की तक़दीर।।
वाणी में केवल नहीं, देशभक्ति का वास।
सेवा, व्रत, आचरण में, चमके इसका प्रकाश।।
कुल, ग्राम, परदेस में, राष्ट्र-विश्व में मान।
सच्चे कर्मों से मिले, महापुरुष पहचान।।
भोगवाद, स्वार्थ उभर, धुँधली राष्ट्र-पुकार।
त्याग, परिश्रम, कर्म से, मिटे पतन अंधकार।।
मुख से केवल ना कहें, देशभक्ति की बात।
निर्मल सेवा से करें, नव युग की शुरुआत।।
भोगवाद को त्यागकर, करें राष्ट्र की सेवा।
कथनी तज करनी वरण, यही मोक्ष का मेवा।।
मुख से केवल ना कहें, रखें देश का मान।
निष्कलंक सेवा करें, अर्पित करके प्रान।।
जीवन का हर श्वास अब, राष्ट्र-चरण में लीन।
पल-पल अर्पित देश को, बने न पल भर दीन।।
सुंदर आचरण से रचें, पावन एक समाज।
पहुँचे भारत शिखर पर, चमके जग में आज।।
ऊँच-नीच सब मिल लड़े, नारी और नर साथ।
नाम भले कुछ ही रहे, सबके जुड़े थे हाथ।।
जाति-धर्म का भेद तज, किया सबने सहभाग।
गीता का वह कर्म था, महाक्रांति का राग।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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