क्रमाॅंक:- 708,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष दोहा छंद रचना- उन्मुक्त आकाश

क्रमाॅंक:- 708,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष दोहा छंद रचना- उन्मुक्त आकाश

                     उन्मुक्त आकाश
                        (दोहा छंद)

उदय हुआ दिन-रात अब, चमके सकल जहान।
दूर हुआ तम-जाल सब, जागा जग मतिमान।।

बहता सुंदर यह झरन, गिरता ऊँचे शृंग।
शीतल पावन नीर का, बरस रहा है रंग।।

कल-कल करती जा रही, सुंदर सरिता आज।
हरे-भरे इस छोर पर, सजता सुंदर काज।।

नभ में उड़ते पक्षीयां,फैलाकर निज पाँख।
देख अनूठा दृश्य यह, तृप्त भई हर आँख।।

पीले-पीले फूल यह, मुस्काते सब ओर।
मन पावन रस से भरा, नाचे जैसे मोर।।

पर्वत ऊँचे खड़े यहाँ, छूते नील अकाश।
किरणें रवि की बिखेरतीं, चारों ओर प्रकाश।।

हरियाली की चादर यह, ओढ़े खड़ी जमीन।
प्रकृति रूप को देखकर, मानव हुआ विलीन।।

पवन चले पुरवैया जब, महक उठा सब बाग।
उमड़ा सुख सागर यहाँ,उमगित होता राग।।

भोर भई सुंदर यहाँ, बिखरा अनुपम रूप।
शीतल जल की धार पर, चमके तीखी धूप।।

कहे 'परमानंद' सुनो, ईश कला यह खास।
घट-घट में जो रम रहा, उसका ही अहसास।।

                           परमानंद निषाद 'प्रिय'

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