क्रमाॅंक:- 581, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष छंदमुक्त रचना- पर्यावरण संकट और विकास की अंधी दौड़

क्रमाॅंक:- 581, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष छंदमुक्त रचना- पर्यावरण संकट और विकास की अंधी दौड़

  पर्यावरण संकट और विकास की अंधी दौड़

तप्त हुई धरती सकल, हिमगिरि रहे पिघल।
प्राणवायु संकट फँसी, ओजोन भी अब अल्प।।

गैस-कुंड दिल्ली बनी, यमुना विष की धार।
नियति हमारी बन गई, दूषित पारावार।।

मशीन युग की दौड़ में, घुटा प्रकृति का दम।
पूँजी की अंधी डगर, सुख के साधन कम।।

बाजारों के जाल में, मुनाफ़ा ही है मूल।
लोभ-अग्नि में जल रही, वसुधा अपनी भूल।।

विकसित देशों की डगर, सुख की झूठी प्यास।
अल्प लोग उपभोग में, कर रहे जग का नाश।।

कसम स्वच्छ ऊर्जा की लें, रण का करें विचार।
स्वार्थ-परमाणु द्वंद्व में, बिगड़ा सब संसार।।

चेतावनी विज्ञानी दें, सोए सब निश्चिंत।
सह-अस्तित्व तजा अगर, होगा कल अत्यंत।।

विकास होगा हाथ में, पर न शुद्ध जल-धार।
तरसेगी पीढ़ी नई, लेने को बयार।।

सबल राष्ट्र के हेतु अब, उद्योगन की चाह।
रोजगार सबको मिले, बढ़े प्रगति की राह।।

तजें पुरानी इकाइयाँ, लाएँ नई तकनीक।
पर्यावरण सम्हाल कर, गढ़ें सफलता लीक।।

गंदा जल निर्मल करें, वर्षा जल संचाय।
प्रदूषित जो क्षेत्र हैं, ढूँढें उचित उपाय।।

कठिन नियम लागू नहीं, स्वार्थ खड़ा है द्वार।
चंदे की जो भूख है, रोक रही आचार।।

प्लास्टिक घातक जानिये, मिटे न इसकी मार।
सजग बने जब लाड़ला, तब सुधरे संसार।।

शासन और समाज के, बीच सेतु बन काम।
अलख जगातीं संस्थाएं, तजकर सब आरा।।

नुक्कड़ नाटक कविताएं, और संदेश अनूप।
जन-जन को जाग्रत करें, धरकर विविध रूप।।

वायु और जल बचाइए, रोपें सुंदर पेड़।
मिटे प्रदूषण धरा से, रहे न प्लास्टिक भेड़।।

कोई पाए विश्व-पुरस्कार, कोई गुप्त महान।
मातृ-धरा की सेवा में, अर्पित जिनके प्राण।।

प्रकृति बचे तो हम बचें, यही काल की मांग।
संरक्षण में लगें सब, छोड़ स्वार्थ का स्वांग।।

'जल है तो कल है' सखे, केवल रहे न शोर।
शुद्ध हवा के यत्न को, खींचें अपनी ओर।।

बढ़ते बाज़ारवाद से, टूटा मन का तार।
प्रकृति प्रेम अब हो गया, केवल एक विचार।।

काट दिए सब वन-सदन, खड़ीं अट्टालिका आज।
खेतों में अब उग रहे, मॉल और समाज।।

विष घुलता है नीर में, ज़हरीली है वात।
नदियाँ सब मैली हुईं, सहतीं गहरी घात।।

याद रुलाती आज भी, गैस-परमाणु कांड।
त्राहि-त्राहि जग में मची, काँपा था ब्रह्मांड।।

ऋतु का चक्का डगमगा, मौसम हुआ बेहाल।
घटती आयु मनुज की, रोगों का है जाल।।

पावन ये पंचतत्व हैं, रक्षण धर्म हमार।
'अभी नहीं तो फिर कभी', चेतो हे संसार।।

क्षिति जल पावक गगन अरु, समीर अमित अनमोल।
कण-कण में है पूर्णता, ऋषि बोले अनतोल।।

पर्वत नदियाँ वृक्ष सब, जड़ नहिं सचेत स्वरूप।
प्रकृति पुरुष का मेल यह, अनुपम और अनूप।।

तपा वनों में ऋषियों, रचे वेद के ज्ञान।
प्रकृति तत्व को मानिये, जीवन का आधार।।

पूजा की यह रीति जो, विज्ञानी आधार।
प्रदूषण की मार से, बचा सके संसार।।

तज विलास सादगी गहो, तजो दिखावा आज।
धरती अंबर स्वच्छ हों, सुधरे सकल समाज।।

                        परमानंद निषाद 'प्रिय'

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