क्रमाॅंक:- 582, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष छंदमुक्त रचना-जीवन-सरिता
जीवन-सरिता
निशिदिन बहती रूह यह, तज गिरि-मोह-वितान।
बदले पग-पग जगत के, माया-रूप सुजान।।
वादा तट का कर गईं, विचलित जग-पतवार।
पंथ बदलती ही रही, बीच भँवर की धार।।
कंकड़-पत्थर ने रोका, गूँजी मौन पुकार।
शब्द विसर्जित हो गए, निस्तब्धता साकार।।
साथी छूटे राह में, छले गए सब संग।
आतम अपनी मौज में, विचरत मस्त उमंग।।
वस्ल-ए-सागर भाग्य में, मिटे द्वैत का भान।
एक अकेली धार ही, चली लक्ष्य सोपान।।
'ऋचा' सब्र की धार यह, बोले बिन सब कह दे।
मौन साधना साधि ले, अमृत रस में बह दे।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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