क्रमाॅंक:- 600, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- संस्कारों की धरोहर
संस्कारों की धरोहर
सजी प्रेम की महफिलें, खुशियाँ अपार साथ।
परम पिता की कृपा से, सिर पर उनका हाथ।।1।।
संस्कारों की छाँव में, खिला हुआ परिवार।
श्रद्धा और विश्वास का, बहता यहाँ बयार।।2।।
आँखों में है सभ्यता, मन में गहरा प्यार।
आदर्शों से बन रहा, जीवन का आधार।।3।।
माथे पर चंदन खिला, भक्ति भाव की जोत।
रिश्तों की पावन यहाँ, बहती शीतल स्रोत।।4।।
पुत्र खड़े हैं गर्व से, मर्यादा के संग।
बेटी की मुस्कान में, स्नेह भरा है रंग।।5।।
माता का आँचल सदा, सुख का है भंडार।
पिता सिखाते ज्ञान को, सुखी रहे संसार।।6।।
वेश-भूषा है भारतीय, मन में भरा उमंग।
परंपरा जीवित यहाँ, भक्ति भाव के संग।।7।।
चित्र देख कर मन कहे, धन्य हुआ यह धाम।
जहाँ प्रेम का वास हो, वहीं बसें प्रभु राम।।8।।
एक सूत्र में बंध रहे, मोती जैसे लोग।
सुख-दुख मिलकर बाँटते, सुंदर सुखदेव संयोग।।9।।
फले-फूले यह वंश अब, रहे सदा सुख-शांति।
चेहरे पर खिलती रहे, ऐसी दिव्य सुक्रांति।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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