क्रमाॅंक:- 603, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- संकटमोचन का पराक्रम
संकटमोचन का पराक्रम
शक्ति लगी सौमित्र को, व्याकुल श्रीरघुराय।
भ्रात-नेह में रो रहे, सुख के धाम कहाय।।1।।
मूर्छित लक्ष्मण देख कर, नयन बहे जलधार।
कैसे मुख दिखलाऊँगा, मैं अवध के द्वार।।2।।
वैद्य सुषेण तब कह रहे, पर्वत पर है व्याल।
संजीवनी जो आ गई, टल जाए जंजाल।।3।।
मारुति मन में ठान ली, लाऊँगा उपचार।
भक्त-भक्ति का हो रहा, यहाँ सुयश विस्तार।।4।।
जय श्रीपति कह कर उड़े, भरा गगन में वेग।
पवन-वेग से चल दिए, चीर सकल सुर-मेघ।।5।।
द्रोणागिरि पर पहुँच कर, बूटी लखी न जाहिं।
चमक रहे सब पादपें, कपि उलझे मन माहिं।।6।।
समय अल्प ही हाथ में, मन में किया विचार।
पर्वत ही अब ले चलूँ, तजकर सोच अपार।।7।।
वाम हाथ में गदा धरी, दक्षिण गिरि का भार।
अंबर में उड़ते चले, केसरी-नंद कुमार।।8।।
देख अलौकिक रूप यह, देव हुए हैरान।
संकटमोचन बन गए, अंजनी के हनुमान।।9।।
राम खड़े चिंतित वहाँ, भोर होन की आस।
हनुमत कब तक आयेंगे, व्याकुल मन है खास।।10।।
भानु उदित होने लगा, आए वीर महान।
पर्वत लेकर आ गए, राम-प्राण हनुमान।।11।।
बूटी पीस पिलाई जब, जागी चेतना अंग।
लखन लाल उठकर खड़े, मिटा शोक का रंग।।12।।
हृदय लगाय लखन को, राम हुए निहाल।
आशिष दी हनुमान को, कटा कष्ट विकराल।।13।।
विभीषण और वानर सभी, देख रहे यह दृश्य।
अधर्म पे धर्म की विजय, लिखेगा अब भविष्य।।14।।
भ्रात प्रेम की रीति यह, जग में है अनमोल।
राम लखन की जोड़ी का, सखे न कोई मोल।।15।।
संकटमोचन नाम है, जग में अति प्रतापी।
थर-थर काँपे देख कर, रावण जैसा पापी।।16।।
चित्र कहे यह प्रेम की, अद्भुत एक कहानी।
हनुमत सेवा श्रेष्ठ है, जग में सबने मानी।।17।।
श्रद्धा मन में हो अगर, पर्वत भी उड़ जाए।
राम नाम आधार हो, संकट सब टल जाए।।18।।
राम काज की लगन में, विसराया निज देह।
धन्य भक्त हनुमान हैं, धन्य राम का स्नेह।।19।।
दोहों में लिख दी यहाँ, भक्ति पावन धार।
राम लखन हनुमान की, जय-जयकार अपार।।20।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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