क्रमाॅंक:- 604, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- शबरी के राम
शबरी के राम
जुग-जुग बाट निहारती, शबरी बैठी आज।
राम लखन कुटिया मिले, पूरण हुए सब काज।।1।।
चख-चख मीठे बेर सब, शबरी अर्पण कीन।
प्रेम मगन रघुवर हुए, भक्ति भाव लवलीन।।2।।
जात-पाँत पूछे नहीं, केवल देखे प्यार।
जूठे बेर अनमोल हैं, कर लीन्हा स्वीकार।।3।।
नील वरण सुंदर वदन, कर में धनुष विराज़।
दीन हीन की कुटिया में, आए हैं महाराज।।4।।
नयन नीर बहने लगे, पुलकित हुआ शरीर।
शबरी के मन मिट गई, युगों-युगों की पीर।।5।।
वन की छोटी कुटिया में, छाया सुख अपार।
देवों का देवा मिले, करके वन अवतार।।6।।
भूमि बैठ रघुनाथ ने, मान बढ़ाया आज।
भक्त वत्सल राम हैं, सबके सिर के ताज।।7।।
प्रेम भाव से जो भजे, राम मिलें तत्काल।
शबरी जैसी प्रीति हो, काटें सब जंजाल।।8।।
छप्पन भोग विसार कर, खाए जूठे बेर।
भक्ति रस के स्वाद में, हुए राम जी ढेर।।9।।
धन्य हुई वह भीलनी, धन्य हुआ वन-धाम।
चरणों में मिल गई जगह, जय-जय सीताराम।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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