क्रमाॅंक:- 605, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- केवट का सौभाग्य
केवट का सौभाग्य
गंगा तट पर राम जी, संग जानकी मात।
भक्ति भाव में डूब कर, केवट जोड़े हाथ।।1।।
विनती करता प्रेम से, सुनिए प्रभु श्री राम।
चरण धूल से जो बनी, नारी शिला बेनाम।।2।।
कठवत में जल ले खड़ा, धोवत प्रभु के पाँव।
तर जाएँगे आज सब, केवट और पुर-गाँव।।3।।
मंद-मंद मुसका रहे, केवट का लख प्रेम।
भक्त वत्सल राम जी, करत सदा ही क्षेम।।4।।
भवसागर के पार जो, करते जग का काज।
केवट की नैया चढ़े, आज अवध के राज।।5।।
सिया मात मुस्का रहीं, देख भक्त का भाव।
गंगा की लहरें छुएँ, प्रभु की सुंदर नाव।।6।।
पार उतारा राम को, पहुँचाया उस तीर।
धन्य हुआ वह केवट भी, देख नयन में नीर।।7।।
मुद्रिका दीनी सिया ने, उतराई के रूप।
पर केवट ने ना लिया, देख राम का रूप।।8।।
हम तुम भाई एक से, बोले केवट बात।
मैं नैया तुम जीव को, पार लगाओ नाथ।।9।।
प्रेम विवश प्रभु हो गए, निज भक्त के पास।
केवट के मन में बसे, रघुकुल के आकाश।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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