क्रमाॅंक:- 611, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-संस्कृति की मूरत
संस्कृति की मूरत
श्यामल कुंतल सोहते, मुख पर मंद सिहान।
हरित वसन में सज रही, सुंदरता की खान।।1।।
रूप अनूठा सादगी, नयनों में अनुराग।
भारतीय परिधान यह, जगा रहा सौभाग।।2।।
कानों में झुमके सजे, सुघड़ रूप अभिराम।
मंद-मंद मुस्कान से, महक उठा यह धाम।।3।।
पहने सुंदर ओढ़नी, धानी रंग सुहाए।
जैसे सावन मास में, प्रकृति हरषाए।।4।।
हरे वसन पर श्वेत ये, बिंदु बने अनमोल।
मन को सहज लुभा रहे, बिन बोले अनबोल।।5।।
शांत सरल चितवन यहाँ, पावन निर्मल रूप।
धीमे से खिली हो जैसे, शरद मास की धूप।।6।।
नत नयनों में छुपी है, एक अनूठी लाज।
बिना कहे ही कह गई, मन की बात समाज।।7।।
काले लंबे केश ये, कंधे पर लहराए।
जैसे सावन की घटा, अंबर पर घिर आए।।8।।
संस्कृति की यह मूरत, लगती सबसे प्यारी।
मर्यादा में सजी हुई, गरिमामय सुकुमारी।।9।।
चित्र अनूठा देख कर, मन पावे संतोष।
रूप-रंग सौंदर्य में, कहीं नहीं कोई दोष।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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