क्रमाॅंक:- 612, सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- आत्म-समर्पण और भक्ति
आत्म-समर्पण और भक्ति
दिव्य रूप तेरा प्रभु, अनुपम तेरी सृष्टि।
जाग उठी आत्मा अब, कर दो करुणामय दृष्टि।।1।।
ज्ञान-धूप चमके हृदय, मोह-शीत मिट जाए।
नैन मिले जब ब्रह्म से, अंतस रवि मुसकाए।।2।।
साँस-साँस सुमिरन चले, भक्ति-सुगंध बिखेर।
चेतन छूकर ईश को, मिटी चेतना ढेर।।3।।
भक्ति मार्ग आरम्भ है, प्रभु की मीठी वाणी।
झोली भर दो ज्ञान से, तारो हे कल्याणी।।4।।
मन का पंछी उड़ चला, तज कर माया-जाल।
खोज रहा अब शांति को, भज कर दीनदयाल।।5।।
दी सद्गुरु ने सीख जो, मिटा हृदय का अंध।
अंतस में बहने लगा, अनुपम परमानंद।।6।।
मौन साध बैठी आत्मा, तज कर जग का शोर।
लौ लागी उस एक से, खिंचा चला उस ओर।।7।।
मेरा मुझमें कुछ नहीं, सब कुछ तेरा ईश।
अर्पण कर दी आत्मा, झुका चरण में शीश।।8।।
नाम-सुधा रस पीजिये, तज कर जग के भोग।
कट जाते संसार के, जनम-मरण के रोग।।9।।
कण-कण में तू ही बसा, घट-घट तेरा वास।
मूरख बाहर खोजता, प्रभु हैं तेरे पास।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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