क्रमाॅंक:- 620,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- मिट्टी का मटका: प्रकृति का वरदान
मिट्टी का मटका: प्रकृति का वरदान
तपे धरा जब जेठ में, सूरज उगले आग।
सुखद मटका का जल लगे, जागे सबके भाग।।
फ्रिज और एसी आ गए, घर-घर बोतल बंद।
सौंधी खुशबू मटका की, देवे परम आनंद।।
केवल यह साधन नहीं, संस्कृति का आधार।
इसमें छुपा विज्ञान है, प्रकृति का उपहार।।
सिंधु घाटी से चला, मिट्टी का यह नाता।
संकट में गरमी के यह, शीतल जल दाता।।
बिन बिजली बिन फ्रिज सदा, पूर्वज रहे निरोग।
सीख प्रकृति से ले किया, मिट्टी का उपयोग।।
सिंधु काल से चल रहा, मटके का इतिहास।
प्रकृति संग जीवन जिए, आदिम जन का वास।।
बिन बिजली बिन फ्रिज रहे, पूरबज रहे सुजान।
घट का शीतल नीर पी, रखा स्वस्थ तन-प्रान।।
सूक्ष्म छिद्र घट में बने, वाष्पन का है खेल।
गर्मी बाहर को तजे, जल शीतल बिन तेल।।
फ्रिज का पानी दे विपद, खाँसी गला ख़राब।
मटका धीमे रस बहे, तन को दे अमराब।।
सूक्ष्म छिद्र हैं घड़े में, जल का होय विलाप।
वाष्पन से शीतल करे, हर कर उसका ताप।।
शीतलता अनुकूल है, तन को दे आराम।
फ्रिज का पानी रोग दे, मत कर इसका काम।।
गला खराब रुखास हो, खाँसी और जुकाम।
बचे फ्रिज के नीर से, मटका दे विश्राम।।
मिट्टी में है क्षारता, गुण इसका अनमोल।
संतुलित यह नित करे, पानी का पीएच मोल।।
अम्लीय भोजन आज का, गैस-अपच का मूल।
घड़े का पानी शांत कर, मिटाए पेट की शूल।।
स्वेद बहाए घाम में, पानी-खनिज नशाय।
कमजोरी चक्कर मिलें, जो न तुरंत सुधाय।।
घड़े का पानी सोखता, तन की सब संताप।
प्राकृतिक खनिज देय यह, हरता कष्ट-कलाप।।
खेत काम करते सुघर, हलधर अति अकुलाय।
शीतल जल की चाह में, मटके पास सुहाय।।
धूप-तपन बोतल सहै, केमिकल विष दे डार।
प्लास्टिक तन को डसे, रोग करै अपार।।
मिट्टी का घट है भला, केमिकल से दूर।
शुद्ध रूप पावन जलद, देय स्वास्थ्य भरपूर।।
फ्रिज का पानी है कठिन, जठराग्नि दे मंद।
संतुलित जल घट का पियो, पाचन रहे स्वछंद।।
अति शीतल जल विष समन, भाषा वैद उचार।
मटके का जल अमृतम, आयुर्वेद का सार।।
तपे भूमि जेठौ सरद, बहे लूर की धार।
मटका सीतल जल दियो, जीवन प्राण अधार।।
उल्टी सिर दरदी मिटे, कमजोरी सुधराय।
तन का ताप संवारिके, लू से लेय बचाय।।
राही पथिक मुसाफिरन, सीतल जल की प्यास।
घट घट पानी राखते, पुरखे प्रेम प्रकाश।।
घट माटी का देत है, पर्यावरण को नेह।
गल मिलकर माटी बने, तजे जबहिं यह देह।।
प्लास्टिक की बोतलें, जहर उगलती आय।
नदी समंदर जलमई, धरती को बकसाय।।
रसायन नहिं मशीन नहिं, सुद्ध रूप अनमोल।
कुदरत का वरदान यह, माटी मोल न तोल।।
माटी का गागर घड़े, कुम्हारन के हाथ।
इक घट पानी ना सुघर, चूल्हा जलते साथ।।
छोड़ो बोतल कांच की, अपनाओ यह रीत।
गाँव नगर संभलहिं सबे, बढ़े देस की प्रीत।।
माटी जननी रूप है, देती अन्न अगाध।
जीवन का आधार है, यह संस्कृति की साध।।
शीतल जल घट का पियो, मिले आत्म-संतोष।
सौंधी खुशबू मन हरे, मिटे चेतना-दोष।।
भूले मानव सादगी, कृत्रिम साधन चाव।
सुख मटके के नीर में, प्रकृति का सद्भाव।।
मटका साफ सदैव रख, बदलो जल हर रोज।
स्वच्छता से रोग मिटे, मिले स्वास्थ्य का ओज।।
चलन बढ़ा फिर शहर में, घड़े हुए मशहूर।
घर-दफ्तर मटके रखें, शीतल जल भरपूर।।
होटल और रेस्टोरेंट, परोसें मिट्टी-नीर।
स्वास्थ्य-प्रकृति के प्रति जगे, अब मानव गंभीर।।
विशेषज्ञ और सोशल मीडिया, दें सबको यह ज्ञान।
जीवन शैली प्राकृतिक, दे सबको वरदान।।
शिक्षा-संस्था और संगठन, करें सतत प्रयास।
मटके के गुण पाठ में, लाएँ बाल-निवास।।
सीखेगी जब पीढ़ी नई, सरल प्रकृति के रूप।
स्वस्थ समाज तभी बने, मिटे रोग की धूप।।
प्लास्टिक पर अंकुश लगे, शासन करे उपाय।
पारंपरिक साधन बढ़ें, ऐसा नियम बनाय।।
फिल्में और विज्ञापन भी, लाएँ शुभ संदेश।
प्रचारित हो घट का सलील, बदले सारा देश।।
नूतन तकनीक-परंपरा, दोनों का हो मेल।
संतुलन से ही चले, जग का सुंदर खेल।।
हर नूतन बेहतर नहीं, तजो न पुरातन ज्ञान।
सदा पुरातन व्यर्थ नहिं, समझो चतुर सुजान।।
मटका पानी दे हमें, सुन्दर सहज सुवास।
शीतल करता देह को, मिटे धूप की प्यास।।
पाचन को उत्तम करे, लू से दे आराम।
बिना फ्रिज देता प्रकृति, अमृत जैसा जाम।।
मिट्टी की सौंधी महक, संस्कृति की यह शान।
घड़े का पानी रखे, सदा प्रकृति का ध्यान।।
विरासत इस धरोहर को, सहेजें हम आज।
भावी पीढ़ी को मिले, सुखद स्वस्थ समाज।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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