क्रमाॅंक:- 621,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- न्याय की प्रतिमूर्ति: राजमाता अहिल्याबाई
न्याय की प्रतिमूर्ति: राजमाता अहिल्याबाई
न्याय धर्म की मूरत थीं, शिव शक्ति का रूप।
मालव माटी धन्य थी, पाकर न्याय अनूप।।
घाट कुएँ मंदिर बने, धर्म कार्य हर ओर।
धर्म ध्वजा लहराई थी, भारत के चारों ओर।।
दीन-दुखी और प्रजा की, सेवा ही था मंत्र।
न्यायप्रिय शासन रहा, सुदृढ़ हुआ गणतंत्र।।
शिल्प कला व्यापार को, दिया बहुत सम्मान।
कृषि और कारीगरी, पाकर हुए महान।।
शिव चरणों में सौंप कर, अपना सारा राज।
राजमाता ने किया, सुखद राष्ट्र का काज।।
इकतीस मई को मना, पावन पर्व विशेष।
अहिल्याबाई की कृपा, सुमिर रहा जग शेष।।
परमानंद जी कर रहे, सादर नमन प्रणाम।
गौरवमयी इतिहास का, ले आदर से नाम।।
सोनाखान और परिक्षेत्र, गाए उनका गान।
सच्ची सेवा न्याय से, बढ़ता है सम्मान।।
धर्म संस्कृति की रक्षा, जीवन का मूल मंत्र।
उनकी पावन याद में, हर्षित है हर तंत्र।।
त्याग न्याय और धर्म का, देकर पावन ज्ञान।
अहिल्याबाई का जीवन, जन-जन की पहचान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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