क्रमाॅंक:- 622,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-तेल की बढ़ती कीमतें और उनका प्रभाव

क्रमाॅंक:- 622,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-तेल की बढ़ती कीमतें और उनका प्रभाव

      तेल की बढ़ती कीमतें और उनका प्रभाव

बढ़ती कीमतें तेल की, लाईं भारी सोच।
घरेलू बजटों लगी, होने आज खरोंच।।

वाहन वाले ही नहीं, पीड़ित जन-जन आज।
महँगी सब वस्तुएँ हुईं, रोता सकल समाज।।

अर्थव्यवस्था का नहीं, यह केवल इक प्रश्न।
नीति, नीति और तंत्र का, करता यह अवमर्षन।।

ऊर्जा ही आधार है, प्रगति-पंथ का मीत।
कृषि, उद्योग, परिवहन, सब इसके आधीन।।

जब-जब दाम बढ़े यहाँ, उपजा तीव्र मलाल।
बहस छिड़े चौपाल पर, जनता करे सवाल।।

पर-देशों से मँगाते, अस्सी फ़ीसदी तेल।
वैश्विक हलचल का यहाँ, दिखे तुरत ही खेल।।

कच्चा तेल विदेश में, होता जब भी तेज।
देशी ग्राहक की यहाँ, जेब रही है लेज।।

तेल बजार न केवल ही, आर्थिक व्यापार।
भू-राजनीति करत है, इस पर पूरा वार।।

तनाव पश्चिम एशिया, जल-मार्गों का त्रास।
नीति और संघर्ष से, बढ़े दाम का बास।।

संकट आवे दूर जो, भारत झेले मार।
निर्भर आयात पर, कैसे बचे बजार।।

केवल कच्चा तेल ही, कारण नहीं हुजूर।
केंद्र-राज्य के टैक्स का, खेल यहाँ भरपूर।।

वैट, टैक्स, कमीशन और, लागत का यह फेर।
अलग-अलग हर राज्य में, भाव करे अंधेर।।

सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा बने, इस राजस्व के संग।
पर भारी कर-बोझ से, जन-जीवन है तंग।।

महँगा तेल विदेश का, थमे न टैक्स प्रहार।
दोहरी मार विकास पर, बहस करे सरकार।।

बढ़े दाम पेट्रोल के, व्याकुल सब परिवहन।
भाड़ा बढ़ता माल का, महँगा होता जन।।

अन्न, दूध, सब्ज़ी, दवा, सब पर लागत मार।
मध्यम वर्ग गरीब का, टूट रहा घर-बार।।

महँगा डीज़ल जब हुआ, रोए कृषक समाज।
पम्प, ट्रैक्टर, यंत्र की, बढ़ी लागत आज।।

लागत बढ़ती खेत की, घटता जाता लाभ।
गाँव-गाँव संकट खड़ा, मंदी का सैलाब।।

शहरी मध्यम वर्ग पर, महंगाई की मार।
डिजिटल सेवा सब हुई, महंगी अबकी बार।।

भोजन हो या वस्तु हो, वाहन से ही आय।
ईंधन की बढ़ती कसर, जेबें देय सुखाय।।

ऊर्जा की सुरक्षा बड़ी, तेल मँगाते दूर।
वैश्विक बाजार के झटके, करते हमें मजबूर।।

 सौर, पवन, हाइड्रोजन, और जैव ईंधन सार।
जब अपनाएँगे इन्हें, बदलेगा संसार।।

हो सुलभ, उत्तम, सुदृढ़, वाहन नीति महान।
कम हो निर्भरता निजी, जाम-मुक्त हो प्रान।।

मेट्रो, बस, साइकिल डगर, ईंधन-खपत घटाए।
नगर-ग्राम में किंतु अब, ये सुविधा ना पाए।।

भविष्य ई-वाहन अब, घटे तेल पर आस।
चार्जिंग, बैटरी की कमी, बाधा करे हताश।।

दाम बढ़ाए ना मिटे, प्रदूषण का क्लेश।
नीति समन्वित चाहिए, तभी सुधरेगा देश।।

राजनीति का मंच है, महँगा हुआ पेट्रोल।
विपक्ष घेरे तंत्र को, सत्ता खोले पोल।।

अंतर्राष्ट्रीय चाल है, वैश्विक बाजार खेल।
नियंत्रण किसका यहाँ, महँगा होता तेल।।

कर-नीति सरकार की, ऊर्जा का निवेश।
सुधरे यदि परिवहन, मिटे कर का क्लेश।।

केवल दोषारोपण से, निकलेगा क्या सार।
एकीकृत दृष्टि बने, समझे सब सरकार।।

राजस्व के लोभ में, नीति बने यदि आज।
दीर्घकालिक हल बिना, भटकेगा समाज।।

साझा वाहन का चलन, ईंधन की हो बचत।
सार्वजनिक साधन चुनें, जीवन होवे सतत।।

दाम भले न कम करें, ये छोटे से काम।
बढ़ती महँगाई मगर, थामेगी कुछ गाम।।

बढ़ते पेट्रोल के जनित, केवल भाव न जान।
सुरक्षा, पर्यावरण, नीति, न्याय महान।।

मूल्य वृद्धि यह दे रही, जन-जन को संताप।
पूछे संकट बार-बार, किसकी यह है पाप।।

 राहत को छोड़ अब, ढूँढ़ो दीर्घ उपाय।
स्वाधीन ऊर्जा-नीति ही, संकट दूर भगाय।।

पब्लिक वाहन सुदृढ़ हो, पारदर्शी हो टैक्स।
अक्षय ऊर्जा का सृजन, बदले देश का अक्स।।

 चर्चा केवल दाम की, करना है अज्ञान।
नीति-ढाँचा पर करो, सोच-समझ संज्ञान।।

                        परमानंद निषाद 'प्रिय'

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