क्रमाॅंक:- 623,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना-कवि-धर्म और आत्म-बोध
कवि-धर्म और आत्म-बोध
सत्य लिखो तज मोह सब, तजो जगत का शर्म।
सृजन साधना है अमर, यही तुम्हारा धर्म।।
सुख-दुख है मन का भरम, लिखो आत्म का बोध।
साक्षी होकर जगत में, तजो लोभ अरु क्रोध।।
लिखो देह की डोली अब, लिखो काल की धार।
पर्व-उत्सव सब स्वप्न हैं, सत्य एक करतार।।
लिखो व्यथा संसार की, लिखो शून्यता शोर।
सत्ता मृग-तृष्णा यहाँ, प्रभु सुमिरन की ओर।।
संस्कृति मन का दीप है, लिखो न्याय की ज्योत।
पतझड़-सावन देह है, आत्मा प्राण-असोत।।
तजो देवल और द्वार को, मेटो मन का मान।
घट-घट में जो रम रहा, लिखो वही भगवान।।
क्षणभंगुर संसार यह, लिखो अमर इतिहास।
बीत गया सो राख है, आज श्वास ही खास।।
लेखन से ऐसा जगे, शुद्ध ज्ञान-प्रकाश।
मिटे युद्ध की वासना, हो शांति-आकाश।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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