क्रमाॅंक:- 640,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- वीरांगना रानी दुर्गावती
वीरांगना रानी दुर्गावती
शौर्य-मुकुट मस्तक सजे, हाथ लिए तलवार।
दुर्गावती खड़ी यहाँ, वीर रूप साकार।।
गोंडवाना की आन हित, रण में कूदी वीर।
मुगलों की सेना डरी, देख भयंकर तीर।।
ममता की मूरत रहीं, साहस की अवतार।
मातृभूमि की रक्षा हित, किया प्राण उपहार।।
आसिफ खाँ की फौज को, धूल चटाई वीर।
काँप उठी थी सल्तनत, देख शक्ति गम्भीर।।
शीश झुकाया ना कभी, गरिमा रखी महान।
अंतिम क्षण तक लड़ रही, सिंहनी सी बलवान।।
कटार घोंपी स्वयं को, झुकी न दुश्मन द्वार।
अमर हुआ बलिदान वह, गाए सब संसार।।
नमन करूँ उस वीर को, कोटि-कोटि हर बार।
रानी दुर्गावती का, यश है अपरम्पार।।
त्याग और बलिदान की, तुम हो अमर कहानी।
गोंडवाना की भूमि की, रक्षक चतुर सयानी।।
रणचंडी सी चमकती, खड्ग हाथ में धार।
मातृभूमि के मान पर, वार दिए सब प्राण।।
आज दिवस बलिदान का, शीश झुकाएँ वीर।
तुझसे ही पावन हुई, नर्मदा की तीर।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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