क्रमाॅंक:- 646,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- कबीर रूप-दर्शन
कबीर रूप-दर्शन
शीश टोपी सोहे भली, नीले नभ की कोर।
मुख पर अनुपम शांति है, मनवा नाचत मोर।।
मस्तक मोरपंख सजे, ज्ञान रूप उजियार।
कथनी-करनी एक है, महिमा अपरम्पार।।
श्वेत केश और दाढ़ी स्वच्छ, निर्मल पावन रूप।
अंधकार सब मिट गया, खिली ज्ञान की धूप।।
कंठ मणियाँ सोहतीं, माला जपे अनूप।
भीतर का दीपक जला, तजकर मिथ्या रूप।।
भगवा ओढ़े संत वर, मन में वैराग भाव।
भवसागर से तारता, तिनका जैसी नाव।।
नयन मूँद चिंतन करें, अंतर उपजा ज्ञान।
कण-कण में साहिब बसे, यही कबीर का ध्यान।।
जाति-पाति का भेद तज, प्रेम सिखाया सार।
सच्चा सतगुरु वोही है, जो उतारे पार।।
बाण चले जब शब्द के, मन का संशय जाय।
साधु संगति जो करे, अमृत रस वो पाय।।
सादा जीवन उच्च मति, बुना जगत का तान।
राम-नाम की ओढ़ पट, सच को लिया प्रथान।।
कबीर मूरत सामने, श्रद्धा शीश झुकाय।
वाणी उनकी अमृत सम, जीवन सफल बनाय।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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