क्रमाॅंक:- 647,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- प्रकृति और प्रगति का द्वंद्व

क्रमाॅंक:- 647,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- प्रकृति और प्रगति का द्वंद्व

            प्रकृति और प्रगति का द्वंद्व

हरी-भरी यह चेतना, सुंदर स्वच्छ प्रकाश।
एक तरफ जीवन हँसे, पावन नीला आकाश।।

दूजी ओर धुआँ उड़े, चिमनियों से अपार।
सूखी धरती रो रही, संकट में संसार।।

अन्न कनक सा पूजते, कृषक हमारे भ्रात।
चावल की हर एक कनी, भरती सबका गात।।

मेहनत की इस कोख से, जनमा यह अनमोल।
हाथों में जो अन्न है, उसका क्या है मोल।।

तप कर धरती फट रही, बूँद-बूँद को त्रस्त।
मानव की नादानियाँ, करती जग को ध्वस्त।।

एक तरफ़ है खेत में, हरा-भरा संसार।
दूजी तरफ है भूख की, जलती हुई पुकार।।

आधी खुशियाँ मुस्कुराएँ, आधा संकट घोर।
अपनी इस वसुधा को तुम, देखो चारों ओर।।

कलकल बहती नदियाँ थीं, अब तो धूल उड़ाय।
सच्ची दौलत अन्न है, भूल न जाना राय।।

पेड़ लगाओ जगत में, रोक सको जो ताप।
अन्न सुरक्षित तब रहे, कम हो जब यह पाप।।

प्रकृति बचेगी तो बचे, मानव का अस्तित्व।
हरी-भरी धरती रहे, यही हमारा नित्य।।

                      परमानंद निषाद 'प्रिय'

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