क्रमाॅंक:- 649,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- सतलोक के स्वामी कबीर
सतलोक के स्वामी कबीर
श्वेत वस्त्र सिर टोपी सोहे, मुख पर अनुपम नूर।
कमल कली आसन सजे, तेज रहा भरपूर।।
मयूर पीठ पीछे खड़ा, महिमा कही न जाय।
दिव्य मण्डल चमचमा, मन का तिमिर मिटाय।।
नभ मंडल में ऊँ लिखा, गूंजे अनहद नाद।
सत्यलोक की भूमि पर, मिटे सकल अवसाद।।
स्वर्गपुरी सी दिख रही, दिव्य नगरिया आज।
तेज पुंज का मार्ग यह, पावन सकल समाज।।
गतिकर जोड़े स्तुति करें, भक्त खड़े निष्काम।
भवसागर से पार कर, दे दो अपना धाम।।
उजला रस्ता ज्ञान का, प्रभु चरणों तक जाय।
जो इस पथ पर चल पड़ा, जनम मरण मिट जाय।।
तरुवर सुंदर छा रहे, खिले फूल रंगीन।
परम शांति का वास है, सुर नर मुनि मन लीन।।
सुंदर आसन एक धरा, नीचे सुंदर घाट।
गुरु कबीर की भक्ति बिन, सूनी दिखे ईंट-बाट।।
हाथ उठा आशीष दें, दया सिंधु करतार।
नाम जहाज जो दे दिया, उतरी दुनिया पार।।
चित्र अलौकिक देख कर, जागा मन में ज्ञान।
कहैं कबीर सुन साधु भाई, भजो नाम भगवान।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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