क्रमाॅंक:- 664,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- रुक्मिणी-हरण
रुक्मिणी-हरण
सुमिरन करि घनश्याम को, हृदय लगाय प्रितम।
रुक्मिणी हरण प्रसंग का, गाऊँ यश उत्तम।।
शिशुपालहि ब्याहन चले, पिता भीष्मक अज्ञान।
लिखी पत्रिका प्रेम की, तजकर कुल की कान।।
विप्र सुदामा को दिया, पत्र सौंप सुकुमार।
वेगि पधारो द्वारिका, तजो न मदन गोपाल।।
बाट निहारें रुक्मिणी, व्याकुल भयो परान।
कहा ढील कीन्ही प्रभो, हे करुणा निधान।।
चलीं भवानी पूजने, सखियाँ मंगल गाय।
रूप अनूप किशोर का, लखि सुरपति लजाय।।
गरजत आये द्वारिका, मोहन रथ सवार।
भीड़ चीर आगे बढ़े, भक्तन के रखवार।।
पकड़ि हाथ सुकुमारी का, रथ पर लीन्हा बैठाय।
देखत रह गये भूप सब, शत्रु रहे पछताय।।
रुक्मी युद्ध करन उठा, महाक्रोध में आय।
मूंड मुड़ायो भ्रात का, कृष्ण दिया समुझाय।।
लेकर लाडो रुक्मिणी, पहुँचे द्वारिका धाम।
मंगलगान भयो नगर, आनंद भयो ललाम।।
रुक्मिणी हरण प्रसंग जो, गावैं प्रेम बढ़ाय।
रिद्धि सिद्धि सुख सम्पदा, पावैं कृष्ण सहाय।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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