क्रमाॅंक:- 665,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- वीर धरा: शिशुपाल पर्वत
वीर धरा: शिशुपाल पर्वत
महासमुंद की भूमि पर, सरायपाली शान।
शिशुपाल यह वीर धरा, अनुपम वितान मान।।
दस किलीमीटर में फैला, बूढ़ा डोंगर नाम।
गोद प्रकृति की बैठ कर, मन पावे विश्राम।।
क्षमाखूंटी चोटी छुए, अंबर को हर बार।
मन भावन बारिश मिले, झर-झर घोड़ाधार।।
ग्यारह सौ फीट ऊपर से, गिरता पावन नीर।
कण-कण पर्वत का कहे, अमर कथा गम्भीर।।
शीश उठाए खड़ा जो, याद दिलाए मान।
घेरा जब अंग्रेज ने, झुका न राजा तान।।
पट्टी बांधे आँख पर, वीर कुदाए घोर।
प्राण दिए पर मिटने, दी न आन की भोर।।
तभी नाम इसका पड़ा, सुंदर शिशुपाल।
साहस ट्रैकिंग के लिए, दुनिया है बेहाल।।
शिखर विराजे देव हर, नीचे माई धाम।
सिंदूर पेड़ के आँगन, श्रद्धा ज्योति ललाम।।
संक्रांति शिवरात्रि पर, मेला सजे महान।
घोरघाट के आँगन में, गूंजे लोक वितान।।
जड़ी बूटियों का यहाँ, भरा हुआ भंडार।
खुलते तरक्की के डगर, युवा रोज़गार पार।।
मिले नई पहचान अब, सरायपाली ग्राम।
पर्यटन स्थल यह बने, यही हुंकार तमाम।।
बदलेगी इस अंचल की, अद्भुत सूरत आज।
कहता प्रिय निषाद यह, गढ़ें छत्तीसगढ़ राज।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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