क्रमाॅंक:- 692,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- सिंधु तट पर श्रीराम
सिंधु तट पर श्रीराम
सागर तट पर आ गए, सैन्य सहित श्रीराम।
वानर दल व्याकुल खड़ा, लखि सागर का धाम।।1।।
सिंधु विशाल तरंगमय, मारुत वेग प्रचंड।
कैसे पार करेंगे हम, यह जल-राशि अखंड।।2।।
लक्ष्मण धीरज धरत हैं, देखि बंधु का रूप।
सकल कपीश्वर संग हैं, अति बलवान अनूप।।3।।
नील सुषेण अंगद खड़े, नल के मन में सोच।
सागर पार उतारना, तनिक न करिए लोच।।4।।
मारुत-सुत हनुमान ने, लीन्हा रूप विशाल।
बोले धीरज धारिये, काटेंगे सब काल।।5।।
प्रभु आज्ञा दें यदि मुझे, लाँघूँ सिंधु अपार।
पल भर में मैं लाऊँगा, सीता का अभिसार।।6।।
राम चन्द्र व्याकुल हृदय, देखत सिंधु अथाह।
विनय करेंगे तीन दिन, माँगेंगे हम राह।।7।।
चाप चढ़ाकर हाथ में, बोले धीरज धार।
मर्यादा का पालना, जीवन का है सार।।8।।
बैठ गए तट पर प्रभु, धारि ध्यान मन माहिं।
सिंधु देव भी मार्ग अब, देंगे तनिक डराहिं।।9।।
जय जयकार हुई तहाँ, गूँजा नभ का छोर।
सकल सैन्य तत्पर खड़ी, राम चन्द्र की ओर।।10।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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