क्रमाॅंक:- 693,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- रूप सादगी
रूप सादगी
रूप अनूपा राधिका, मन में सहज सनेह।
हरित वसन की ओट में, चमके कंचन देह।।
घूँघट सरका मुख खिला, मंद-मंद मुस्काय।
हरी साड़ियाँ अंग सजी, मनवा मोहा जाय।।
सुंदर कंगन हाथ में, अँगूठी सोहे पास।
नयन झुकाए सोचती, मन में भरा उल्लास।।
सावन का यह रूप है, या कोई त्यौहार।
धरा हरी सब हो गई, उपजा मन में प्यार।।
मर्यादा की मूरते, भोला-भाला रूप।
छाँव लगी वह धूप में, जैसे खिली अनूप।।
चूड़ी खनके हाथ की, पायल करती शोर।
बैठी सुध-बुध खोए वह, ताके अपनी ओर।।
हरित रंग सौंदर्य का, प्रकृति का उपहार।
शर्म हया गहना बना, अद्भुत रूप अपार।।
माथे बिंदिया लाल है, अधरों पर लाली।
देख रूप यह सुंदरी, झूम उठी डाली।।
सोच रही कुछ अनमनी, खोई-खोई आज।
मन के आँगन में बजा, धीमे से कोई साज़।।
काव्य रूप यह सुंदरी, देख हुआ मन मौन।
इस जग में इस रूप की, समता करता कौन।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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