क्रमाॅंक:- 699,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना - विनय और बाण
विनय और बाण
सागर को श्री राम ने, देख किया प्रणाम।
बैठ गए तट पर तभी, तजकर सब विश्राम।।
विनय शील रघुनाथ हैं, गरिमा का यह रूप।
हाथ जोड़ सम्मुख खड़े, स्वयं चराचर भूप।।
तीन दिवस बीते यहाँ, करते रहे गुहार।
मार्ग देव प्रभु को अभी, तजो मौन की धार।।
सिंधु हृदय पिघला नहीं, देख राम का नेह।
भय बिन प्रीति न होत है, कहती व्यापक देह।।
लखन लाल व्याकुल हुए, देख सिंधु की चाल।
बोले चाप उठाइये, अब रघुवीर दयाल।।
विनय न माने जलधि यह, जड़ स्वभाव अवरोध।
सच्चा आदर तब मिले, जब जागेगा क्रोध।।
खींच सरन को हाथ में, प्रभु ने कीन्हा कोप।
थर-थर काँपा सिंधु तब, हुआ धीरता लोप।।
शरणागत तब जलधि हुआ, तजकर सब अभिमान।
रत्न छुए प्रभु चरण को, माँगा अभय प्रदान।।
नाथ क्षमा अपराध हो, मैं हूँ जड़ अज्ञान।
मर्यादा मत भूलिए, रघुकुल के सुभान।।
रचहु सेतु अब सिन्धु पर, पार करहु सब फौज।
'परम' राम की कृपा से, मिटे काल की मौज।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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