क्रमाॅंक:- 701,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना - श्री विश्वकर्मा: शिल्प-सृजन की महिमा
श्री विश्वकर्मा: शिल्प-सृजन की महिमा
देवों के शिल्पी प्रवर, पूजे सकल जहान।
शिल्प-कला वैभव अमित, तुम ही चतुर सुजान।।
हाथ हथौड़ा ले खड़े, रचते दिव्य स्वरूप।
सुंदर जग का रूप धरें, शिल्पी तुम अनुपम रूप।।
सृष्टि को आकार दिया, तुम्हारी अद्भुत देन।
ज्ञान-विमल मन में जगा, हर लो तम के नैन।।
विश्वकर्मा विश्व-रूप, छवि लगती कमनीय।
शिल्प-कर्म पावन परम, जग में है वंदनीय।।
अस्त्र-शस्त्र सुंदर बने, वैभव मिला अपार।
देवराज का वज्र भी, है तुम्हारी कला उदार।।
स्वर्ण-लंका चमकी खड़ी, सुंदर पुरी विशाल।
द्वारिका नगरी रची, अद्भुत शिल्प-कमाल।।
साधन सारे पूजते, कारीगर हर रोज।
कृपा तुम्हारी जब मिले, बढ़ता मन का खोज।।
बुद्धि, ज्ञान, बल दीजिए, हे प्रभु परम महान।
शिल्प-विधा जग में बढ़े, सब पाएँ सम्मान।।
रूप मनोहर आपका, हरता सब संताप।
शरण पड़े जो आपकी, मिटें सकल संताप।।
परमानंद पाएँ सभी, नित गावें गुणगान।
विश्वकर्मा प्रभु दीजिए, विमल भक्ति का दान।।
परमानंद निषाद ‘प्रिय’
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