क्रमाॅंक:- 721,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष दोहा छंद रचना- विजयादशमी
विजयादशमी
(दोहा छंद)
खींच धनुष रघुनाथ ने,बाण चलाया तान।
जलकर रावण ढह गया, टूटा गया अभिमान।।
पाप बढ़ा जब भूमि पर, तब आए श्रीराम।
असुर राज का अंत कर, सिद्ध किए सब काम।।
सत्य रहा अविजित सदा,भले लगी कुछ देर।
जीत धरम की ही हुई, भागे दानव ठौर।।
शोले से आकाश में, जला आज दसशीश।
न्याय देख संसार में, हर्षित विश्वेश।।
विजया दशमी पर्व यह, देता यह संदेश।
मन से रावण को तजो, छोड़ो शत्रुता द्वेष।
स्वर्ण पुरी लंका मिटी, मिटा वंश का मूल।
अहंकार में जो जिए, मिले अंत में धूल।।
चमक उठी रघुवीर की,नभ में जब तलवार।
अत्याचारी खल मरा, जीता सत्याचार।।
कागज का रावण जला, गूँजा जय जयकार।
भीड़ खड़ी हर मोड़ पर, हर्षित अब संसार।।
जो भी करता पाप है, मिटता उसका नाम।
पुण्य कमा कर जगत में, पाएं बैकुंठ धाम।
घर-घर दीपक जल उठे, भगा अवध का शोक।
राम राज की छाँव में, सुखी हुए सब लोक।।
परमानंद निषाद 'प्रिय
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