क्रमाॅंक:- 722,सोनाखान, जिला-बलौदा बाजार,छत्तीसगढ़ से कवि परमानंद निषाद"प्रिय" की विशेष रचना- गुंजा की गूँज
गुंजा की गूँज
उदित भानु की रश्मियाँ, बिखरीं चारों ओर।
गुंजा की सुंदर छटा, मन को लेती चोर।।
कल-कल बहती जा रही, पावन सलिल तरंग।
तट पर महके गूँजती, गुंजा अपने रंग।।
रक्त-श्याम मणियाँ सजीं, अद्भुत रूप अनूप।
तट की पाषाणी शिला, चमके ओढ़ सधूप।।
गूंज उठी गुंजा यहाँ, सुंदर सरिता तीर।
प्रातः काल सुगंध से, महक रहा है नीर।।
अरुण रंग नभ में खिला, जागा पावन भोर।
माला सुंदर सजि रही, पाषाणों के छोर।।
काली-लाल सुहावनी, गुंजा की यह माल।
वृंदावन की याद में, विह्वल हुए कृपाल।।
हरित पत्र की छाँव में, लटकी सुंदर बेल।
काली राती मणियाँ, रचतीं अनुपम खेल।।
उदित भानु जल में करे, कनक वरण की धार।
गुंजा सुमिरन कर रही, प्रकृति रूप श्रृंगार।।
रूखे-सूखे पत्थरों, पर गुंजा का वास।
भीतर छुपा अनूप है, अनुपम एक प्रकाश।।
शांत नदी का तट यहाँ, गुंजा की है गूँज।
मन को पावन कर रहा, अनुपम किरण निकुंज।।
परमानंद निषाद 'प्रिय'
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